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Tuesday, April 13, 2021

आपस में लड़ रहे थे अफ्रीका के खूंखार आदिवासी, हिंदू संस्कृति ने यूं जोड़े दिल

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नई दिल्ली। प्राकृतिक संपदाओं और विविधता के धनी अफ्रीका को इंसानों की आदिम भूमि भी कहा जाता है। पशु- पक्षियों से लेकर आदिवासी जनजातियों की अविश्वसनीय परंपराएं भी यहां देखने को मिलती हैं।

खास बात यह है कि पिछले कई साल में यहां भारतीय संस्कृति और आबादी ने अपनी अहम जगह बनाई है। इसके लिए अफ्रीका के कई देशों में काम कर रहे संस्कृति कर्मियों ने बताया कि कभी वहां की खूंखार आदिवासी प्रजातियां एक-दूसरे से लड़ती रहती थीं लेकिन भारतीय रीति-रिवाज और सामाजिक परंपराओं में अब उनका मन लगने लगा है। एक ओर जहां चीन अफ्रीकी देशों को कर्ज के जाल में फंसा रहा है, भारतीय समुदाय के योगदान से यहां धीरे- धीरे आपसी प्रेम बढ़ने लग गया और शांति फैलने लगी।

साथ रहते हैं सभी धर्म
ईसाई धर्म और इस्लाम से पहले अफ्रीका में कई तरह के धर्म भी प्रचलित थे जिनमें से आज भी कुछ धर्म प्रचलन में हैं। यहां आज भी ज्यादातर लोग मुस्लिम हैं या ईसाई। यहां आबादी का 45 प्रतिशत भाग मुस्लिम है और 40 प्रतिशत भाग ईसाई। वहीं, 15 प्रतिशत दूसरे धर्मों के लोग रहते हैं। एक अनुमान के मुताबिक हिंदुओं की आबादी पूर्वी अफ्रीका में लगभग 6,67,694, दक्षिणी अफ्रीका में लगभग 12,69,844 और पश्चिमी अफ्रीका में लगभग 70,402 है।

सदियों से चला आ रहा रिश्ता
भारत और अफ्रीका के बीच सांस्कृतिक संबंधों का इतिहास बहुत रोचक रहा है। औपनिवेशिक इतिहास की वजह से भारत का अफ्रीका के साथ सदियों पुराना रिश्ता रहा है। हिंदुस्तान जब ब्रिटेन की कॉलोनी हुआ करता था, तब अफ्रीका के भी ज्यादातर भूभाग ब्रिटिश राज के नियंत्रण में हुआ करते थे।

अंग्रेज भारतीयों को अफ्रीका में रेलवे ट्रैक बिछाने और खेती का काम करवाने के लिए 19वीं सदी में मजदूर के रूप में लेकर आए थे। इनमें से बड़ी तादाद हिंदू मजदूरों की थी, जो धीरे-धीरे अफ्रीका में ही रच बस गए। अफ्रीका में गुजराती व्यवसायी भी व्यापार के सिलसिले में जाकर बस गए। भारतीय संस्कृति को लेकर यहां की स्थानीय आबादी में अलग ही आकर्षण है जिसके कारण इसका विस्तार होता जा रहा है।

जुड़ते रहे तार
इसका एक उदाहरण घाना में देखने को मिलता है जहां स्वामी घनानंद सरस्वती ने 1975 में द हिंदू मॉनेस्ट्री ऑफ अफ्रीका और मंदिर की स्थापना की थी। स्वामी घनानंद घाना के ही एक गांव में पैदा हुए थे। स्वामी घनानंद बताते थे कि बचपन से ही वह ब्रह्मांड के रहस्यों के बारे में सोचते रहते थे।

फिर वह ऋषिकेश की यात्रा पर निकल पड़े जहां स्वामी श्रद्धानंद ने उन्हें घाना लौटकर एक मंदिर की स्थापना करने की सलाह दी। इस मंदिर में आने वाले स्थानीय लोगों की संख्या धीरे-धीरे बढ़ती चली गई और इसके साथ ही हिंदू आबादी भी करीब तीस हजार पार कर गई।

हर देश में विस्तृत संस्कृति
स्थानीय भारतीयों ने दक्षिण अफ्रीका में कई मंदिरों और धार्मिक स्थलों का निर्माण किया है जिनमें से एक इनांडा गांव का प्राचीन माउंट एजकोम्ब गणेश टेंपल भी है जिसका निर्माण 1799 में क्रिस्टाप्पा रेड्डी ने करवाया था। ऐसी तस्वीर नाइजीरिया, केन्या, मोजांबिक में भी देखने को मिलती है।

यहां पारंपरिक भारतीय तीज-त्योहारों को बड़े धूम-धाम से मनाया जाता है। लाइबेरिया में भी भव्य गणेश विसर्जन की शोभायात्रा निकाली जाती हैं। आधुनिक दौर में यहां इंटरनेशनल सोसायटी फॉर कृष्णा कांशसनेस (इस्कॉन) ग्रुप ने बहुत काम किया है और भारतीय संस्कृति का विस्तार किया है। तंजानिया में फिलहाल भारतीय मूल के लोगों की तादाद लगभग 50,000 है और यहां भी बड़ी संख्या में हिंदू मंदिर और सामुदायिक केंद्र स्थापित किए गए हैं जहां भारतीय रंग देखने को मिलते हैं।

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